| پانــــصد و هـــفتاد از مـــیـلاد رفـت |
| از ربـــیـع الاولش شــد ده و هـفت |
| در عرب این سال عـام الفـیــل بــود |
| نـقــشـه آن ابــرهـه بـــر نـیـل بـود |
| نـــور دیـــدی آمــنـــه در آســمـــان |
| گشت شرق و غرب روشن ناگهـان |
| قـصـرهـا در شـام و در بـُصری بدیـد |
| شـاد گـردیـدش بـدان بـخـت جـدید |
| در شـب مـیـلاد بــت هـا سـرنـگـون |
| تـخـت چـنـدیـن پـادشه شد واژگون |
| بـحـر سـاوه خـشـک گردید و بتافـت |
| بیت کسری چهارده جایش شکافت |
| پـــارســی را بــود یــک آتـشـکـــده |
| آتــشـی روشـن بـدان از ده ســده |
| نــام احـمـد چــون بـشد انـدر بـرش |
| خاک خاموشی نشستی بر سرش |
| آمــنـــه آورد فــــرزنـــدی یــتـــیــم |
| شـد مَلـک انـدر فـلـک او را نــدیـم |
| جـد او عـبـدالـمـطـلـب چـون شنیـد |
| ذبــح قـربـانـی نـمـودش آن سـعید |
| شکـر کـرد و حـمـد مـحـمود نــعیـم |
| شــد بـــر او الـهــام از ربِّ عـلـیــم |
| چـون ستوده هست ایـن طفل یتـیم |
| نـــام احــمــد را مـحـمـد می بریم |
| او سه روز از مادرش چون شیر خورد |
| آمـنـه او را بــه یــک دایـــه سـپـرد |
| پـس سـه مـاهـی را ثـُوَیبه شیر داد |
| احــمــد او را روز خــیــبــر کـرد یـاد |
| چـهـار مـاهـی از تـولـد چون گذشت |
| دایـه ای دیـگر به دامن او نشست |
| آن حـلـیـمــه بـــود از اقــوام سَـعـد |
| از یـتـیـم او رخ گرفتش همچو جعد |
| چـــون نـدادنــدش صـبــیّ دیـگــری |
| عـلـتــش هــم بـــود او را لاغــری |
| گـفـت شـویـش را کـه آن طفل یتیم |
| مـی بـریـمـش تـا کنـد لطفی کریم |
| حـدس او صـائـب بـشد از لطف حق |
| زنـدگـی هـر روز بـهــتـر از سـبــق |