| روزگاری است که من طالب دلدار شدم |
| رهــرو مــخـلــص آن قافـله سالار شدم |
| هـمــچو مجنون دل افکار به امـید وصال |
| والــه پـیــچ و خــم کـــوچـه و بازار شدم |
| غــرقــه در کــوثــر عشق ازلــی گردیدم |
| هـفــت تــکـبـیـر زدم وز هـمـه بیزار شدم |
| عـنــدلـیــب سـحرم تــا کـه سرایم غزلی |
| راهــی روضــه خــضـــراء و چـمنزار شدم |
| هـفـتـمـیـن اخـتـر تــابـان سماوات وجود |
| مـتـجـلــی شــد و مـن پـاک ز پـنــدار شدم |
| کـنـج زنــدان بـــلا خــلــوت اسرارش بود |
| نــوحـه گـر گــشتــم و هم لاعن جبار شدم |
| کاظمین قبله دلهای نژند است و پریــش |
| تــن رهــا کــردم و مـشـتـاق سر دار شدم |
| درس آزادی و آزادگــی و عــــز و شــرف |
| از وی آمـوخــتــم و در صف احــرار شــــدم |
| پــرتـــو موعــظهاش جان مرا روشن کرد |
| خــواب غــفــلــت گــذرانـیـدم و بـیـدار شدم |
| هـر دو عــالم ثـمـن بـخس گل رویش باد |
| گــریه و آه ز هـجـــرانــــش خــریــدار شدم |
| بــا تـن پـاک وی آن زهـر جفا چونان کرد |
| آه از ســــــوز دل آوردم و بــیــــدار شـــــدم |
| تا که اوصاف کـمالش به دل من ره یافت |
| فــاش گویــم کــه بـه سوداش گرفتار شدم |
| تـا ورا یــافـتـم، آن واسطه فیض و کمال |
| در رهش یکسره من بی سر و دستار شدم |
| (صبحی) از جام محبت بچشید و بسرود |
| ایــن غــزل، کــز نـفـسـش غالیه گفتار شدم |